Saturday, January 29, 2011

कुछ भी न हो मगर सपने हज़ार हैं-------


कुछ भी न हो मगर सपने हज़ार हैं,
आँखों में इनकी देखिये बस प्यार-प्यार है.

माँ-बापू खेत को गए, दादी भी सो गयी,
चकल्लस करें जरा कि शमाँ खुशगवार है.

दुनियावी भीड़ में कहीं खोये न बचपना,
बस, उसको बचाना यही इनकी गुहार है.

मक्का न मदीना, काशी न अयोध्या,
चेहरे पे इनके दो जहाँ की हर मजार है.

2 comments:

  1. सुन्दर... उमेश भाई... आभार.

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  2. आपके ब्लॉग पर आकर अच्छा लगा. हिंदी लेखन को बढ़ावा देने के लिए आपका आभार. आपका ब्लॉग दिनोदिन उन्नति की ओर अग्रसर हो, आपकी लेखन विधा प्रशंसनीय है. आप हमारे ब्लॉग पर भी अवश्य पधारें, यदि हमारा प्रयास आपको पसंद आये तो "अनुसरण कर्ता" बनकर हमारा उत्साहवर्धन अवश्य करें. साथ ही अपने अमूल्य सुझावों से हमें अवगत भी कराएँ, ताकि इस मंच को हम नयी दिशा दे सकें. धन्यवाद . आपकी प्रतीक्षा में ....
    भारतीय ब्लॉग लेखक मंच
    डंके की चोट पर

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